
ब्रिटेन जैसे देश में भोजन की संस्कृति नब्बे के दशक की शुरुआत में हंसी-खुशी से बदल गई। इसके साथ ही मेरे एक शाकाहारी मित्र को तंदूरी मछली से इनकार के बाद उबली हुई पत्ता गोभी खाने की मजबूरी के दूसरे अच्छे विकल्प मिलने लगे। और अब तो चॉप और स्टीक के लिए मशहूर रेस्तरां भी शाकाहारी विकल्प देने लगे हैं। किसी भी सुपर मार्केट में आपको कई तरह के शाकाहारी व्यंजन मिल जाते हैं। मैं जब 20 वर्ष की थी, तभी शाकाहारी बन गई थी, इसलिए नहीं कि मैं भारतीय हूं, बल्कि इसलिए कि मेरा एक ऐसे अमेरिकी से संबंध बना, जो शाकहारी था। वैसे भी आम धारणा के विपरीत ज्यादातर भारतीय शाकाहारी नहीं होते। मैं भी कोई बहुत कट्टर शाकाहारी नहीं हूं, इसलिए शाकाहार का समर्थन करने या लोगों को मांसाहार से दूर रहने का उपदेश देने की पात्रता मुझमें नहीं है।दूसरी बात यह है कि तमाम विचारधाराओं की ही तरह शाकाहारवाद में भी पूर्वाग्रह हो सकते हैं, साथ ही कई तरह के दबाव भी। मैं भारत में पली-बढ़ी हूं, इसलिए अच्छी तरह से जानती हूं कि कैसे खाने-पीने के आग्रह अपनी जातिगत और धार्मिक श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। कभी-कभी तो इनका रूप हिंसक भी होता है।…





