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ट्विटर पर इन दिनों एक बहस छीड़ी हुई है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी ने ट्विटर पर स्टॉप यूलिन 2015 हैशटैग से अभियान छेड़ा है, जिसमें चीन के इस बर्बर त्यौहार का विरोध किया गया है। चीन में मांसाहार आम बात है। चीनी रोज औसतन 17 लाख सुअर खा जाते है। कहा जाता है कि चीनियों के भोज्य पदार्थ में हर वह चीज शामिल है जो चार टांगों वाली होती है। वहां बकरी, भेड़, गाय, भैंस, सुअर, कुत्ता, बिल्ली आदि तमाम तरह के जानवरों के साथ ही सांप, केकड़े, ओक्टोपस आदि भी खाए जाते है। जीवित बंदरों को खाने का भी चलन चीन में है। कुत्ते और बिल्लियों का मांस भी चीनी शौक से खाते है।

 

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दुनिया के अधिकांश देशों में मांसाहारियों की संख्या काफी ज्यादा है, लेकिन चीन के यूलिन त्यौहार के बारे में सबसे बुरी बात यहीं है कि यह जानवरों को खाने का बर्बरतम तरीका है। इस त्यौहार में करीब 10 हजार कुत्ते खाए जाते है। चीनियों का तर्वâ है कि सालभर में दस हजार कुत्तों की तुलना में 17 लाख सुअर रोजाना खाना बड़ी बात है। ऐसे में यूलिन पर आपत्ति करना ठीक नहीं। इसके विपरीत पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि चीन में यूलिन त्यौहार के मौके पर जिस तरह कुत्तों को जीते जी जलाकर और फिर उबालकर खाया जाता है वह निर्दयता की पराकाष्टा है। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन कुत्तों में ज्यादातर पालतु कुत्ते होते है, जिन्हें चुराकर बेच दिया जाता है और फिर बाद में खा लिया जाता है। इन कुत्तों को काटने के पहले बहुत ही दर्दनाक स्थितियों से गुजरना होता है। उन्हें कई-कई दिनों तक भूखा-प्यासा रखा जाता है। लोहे की जालियों में लादकर उन्हें लाया जाता है। बेबस कुत्ते चीखते-चिल्लाते रहते है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता। फिर उन्हें जीते-जी जलाकर उबाला जाता है। कई बार तो जिंदा कुत्तों की खाल खींच ली जाती है और फिर उन्हें खोलते पानी में डाल दिया जाता है। 2010  में चीन में इस बारे में कानून बनाने की बात हो रही थी। कुछ राज्यों में कानून बनाए भी, लेकिन उनपर अमल नहीं हो पा रहा।

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